दो बरस जीवन के , और ज़ुल्मों की इन्तहा देखी ,
जानवर और आदमी में , फ़र्क क्या , आँखों देखी ,
कुसूर है क्या मेरा , समझ मुझमें , आने तो दी होती ,
मैं लड़की हूँ , ये क़ुसूर है मेरा तो , क्या मर्ज़ी से बनी ?
था किसी का गर्भ अनचाहा तो , कुसूर कहाँ मेरा ?
कहाँ काबिल थी दांतों से , नश्तर से काटी जाती ?
तू अपना चेहरा तो देख आदमी कहलाने वाले ,
जानवर भी बेहतर है जहाँ शेरनी हिरन को पाले !!
जानवर और आदमी में , फ़र्क क्या , आँखों देखी ,
कुसूर है क्या मेरा , समझ मुझमें , आने तो दी होती ,
मैं लड़की हूँ , ये क़ुसूर है मेरा तो , क्या मर्ज़ी से बनी ?
था किसी का गर्भ अनचाहा तो , कुसूर कहाँ मेरा ?
कहाँ काबिल थी दांतों से , नश्तर से काटी जाती ?
तू अपना चेहरा तो देख आदमी कहलाने वाले ,
जानवर भी बेहतर है जहाँ शेरनी हिरन को पाले !!
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