Sunday, 28 April 2013

हम  ढूँढते  रहे  ख़ुद  को  ,  ज़माने  की  आँख  में ,
और  मिले  तो  आखिर , यार  की , आँखों  में  चुभे  हुए !
क्या  हुए  जो  हम  ,  यार  की  हिफाज़त  में  रहे तैनात ,
यार  को  समझ  आया ,  हम , किसी  खुराफात , में  लगे  हुए !!
अपनी  तो  उन  आँखों  से ,
बन  आई  है  ,
जिन  में  नित  नई  शरारत ,
और  कोरों  में  कन्हाई  है !!

Saturday, 27 April 2013

तेरी  बेपरवाहियाँ  कब  ज़ुल्म  हो  गयीं ,  न  मालूम ,
ये  तन्हाईयाँ  कब  , दिल , पार  हो  गयीं  , न मालूम ,
ये  शहनाईयां कब , ख़ार  हो  गयीं  , न  मालूम ,
अब  सब्र  से हैं ,  हम  कब्र में  हैं ,   बस है  मालूम !!
 

Friday, 26 April 2013

बींध  रहा  मन  का  मणका ,
और  घूम  रही  विचार  धुरी ,
मनका मणका ,  चीख रहा ,
क्यों घूम  रही , क्यों  घूम रही ,
जल धन  रे  गया ,
जल  यश  रे  गया ,
जल  काम  गया ,
कुछ  बस  न  रहा ,
हाय ! छोड़  मुझे ,
ये  जग  भी  गया ,
मुझे  न  जाना  रे , पास पिया ,
रम  गया मन  , इस  हास पिया ,
सुन  री धुरी  ,  अरे  सुन  री  धुरी ,
किस  धुन में  तू , घूम  रही ?
रे मन  ,  मैं  तो  बस हूँ ,पास  खड़ी ,
जो  घूम  रही , है विवेक  लड़ी ,
संग में  अपने , तुझे घुमा रही ,
तेरे  अंतर को  है , जगा  रही ,
त्याग  रे  मोह  तू , इस  तन  का ,
बिंध  जाने  दे  मन  का   मणका !!




 
पृथक   कर  देखो  कभी  ,
सत्य  को  असत्य  से ,
विष  को  अमृत  से ,
देव  को  राक्षस  से ,
पृथ्वी  को  आकाश  से ,
नर  को  नारी  से ,
जीवन  को  मृत्यु से ,
संभव  को  असम्भव से ,
आवश्यक  को  अनावश्यक  से ,
हाँ  को  नहीं  से ,
और  जोड़ते  जाओ  ,  इस  कड़ी  में ,
जो  भी स्मृति  में  आता  है ,
दिखेगा  , बस  एक  ,
जिसमें  सब  समाता  है ,
और  एक  हम  हैं ,  जिन्हें ,
सब  भिन्न नज़र  आता  है !!
मौन  रहो  कुछ  देर  तलक ,
पवन को  कहने  दे , फ़लक़ ,
बहते  बहते , पेड़ों से ,  खिलवाड़ इसे  तू   करने दे ,
कुछ  पत्ते  गिरते  हैं   मृत से ,तो ,
झरने  दे , तू  गिरने दे ,
ये  साएँ  साएँ ,
पत्ते ये  हिलते , दायें  बाएं ,
शाखा  का  मोह  ये  ताक  रहे ,
जड़  से  सम्बन्ध  ,  ये  माप  रहे ,
भूल  रहे  हैं ,  धूप   में  जलना ,
ठंडी  रातों  में ,  बर्फ  का  सहना  ,
भोजन कितना  ये  पका  गये ,
पानी  कितना  उड़ा  गये ,
अब  तो  बस  ये  खेल  रहे ,
पवन  से  इनको  बतियाने  दे ,
झूम  के  इनको  गाने  दे ,
कुछ  देर  ठहर , मत  जगा  इन्हें ,
सुन्दर सपनों  में ,  जानें  दे ,
मौन  रहो  कुछ  देर  तलक ,
पवन  को  कहने  दे  ,  फ़लक़ !!

सोच  में  डूबे  रहे ,  रेत  पर  लिखते रहे ,
पर  टिके  न , वक्त की  स्याही  के  रंग ,
इस  रेत को  पत्थर  बनाना  ,
स्याही  को  पक्का  बनाना , आसाँ  नहीं  है ,
सदियों  की  मेहनत ,  अच्छी  किस्मत ,
और  मेहरबानी  ख़ुदा की  ,  चाहिए  संग !!