Thursday, 10 June 2021

संस्मरण जालंधर शहर के

संस्मरण जालंधर शहर के 1
#संस्मरणजालंधरशहरके
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बात सत्तर के दशक की है , मैं जालँधर में जी ए एम एस कर रहा था , कबीर नगर में डीएवी काॅलेज के बिल्कुल बाहर धर्मपाल किराना मरचैंट के मकान में किराए पर रहते थे । कबीर नगर में अधिकतर या तो श्री मद्दयानंद आयुर्वैदिक कालेज या फिर मेहरचंद पालिटैक्निक कालेज या डीएवी कालेज के छात्र किराए पर रहा करते थे । धर्मपाल के कमरों में मैं Dr Harmesh Banyal का रूम मेट था । एक दिन हम कालेज से अपनें किराए के कमरे में वापिस आ रहे थे कि देखा एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति काँटेदार तारों से पोल छुड़ाकर किसी हट्टे कट्टे लड़के को पीटनें लगा ।
वो साथ में चिल्ला रहा था , " हरामज़ादे , कुत्ते साले , तैन्नूं शर्म नी आऊँदी , कुट्ट खाके जिंदा खड़ा ऐत्थे , हराम दे , साले , या ते मर जाँदा या मार देंदा , मेरा ताँ नाँ ही डुबोत्ता । जाणे केड़ी घड़ी मैं तेरी माँ नूँ व्याह्या , ते केड़ी घड़ी तैंन्नूँ उसने जाया ,  कुत्ती दा पुत्त न होवे कित्थे , साला "
उसका पीटना जारी रहा ।
लड़के नें ज़ोर से बिजली का खँबा पकड़ा हुआ था और चिल्ला रहा था , " बापू , मैंन्नूँ इक बार शड दे ( छड दे ) , मैं उन्हानूँ ज़िंदा नीं शड्डाँ गा , मैं हूणें ई पिस्तौल लिया के उन्हानूँ माराँ गा , ओए तू मैंन्नू जाण दे । "
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क्रमशः :-

Friday, 16 August 2013

दो  टांगों  पे  लड़खड़ाता  है  ,  पर  चाहता  है  चतुर्भुज  होना ,
दो  बूँद  हलक  में  जाते  ही  ,  धरा  चाहता  है  ,  इक  कोना !!

चले  हैं  तो  ,  हर  शै  से  ,  कुछ  ले  के  चलेंगे  ,
उन्हें  बख्शेंगे  इज्ज़त  ,  गुर ,  जिनसे  मिलेंगे !!

सैय्याद  ने  पर  काट  लिए  इसका  किसे  गम ?
हमको  तो  महज़  देखना  है  ,  किसके  लिए मरे  हम ?
समझते  ही  नहीं  सैय्याद  , तड़पना  क्या  है  ,
मौत  के  गलियारों  से  गुज़रना  क्या  है  ,
वो  तो  बस  जानता  है  ,  लुत्फ़  है  शिकार ,
नहीं  जानता  कि  वो  भी  है इक  शौक का शिकार !!

Thursday, 15 August 2013


उम्र  में  शामिल पल  पल , कहाँ  इक  दिन  जिया ?
कहाँ  मौत  आई  अभी , डर  से  काटे  जो  पल  ,
और  जो  कौतुहल  रहा  बीच  में  ?  उसको  किसने  जिया ?
फिर  क्यों  शकुन  अपशकुन  ?  क्यों  ज्योतिषी  के  दर हम ?
और  देखना  चाहे  खेल  का  अंत  खेल  से  पहले  ही  ?

Wednesday, 14 August 2013

बेरुखी  के  आलम  में  , खुशियाँ खुद से , दरकिनार  हुईं ,
ऐसी  नफरत  क्या ? सलवटें ललाट की , सदाबहार हुईं !!
मंजधार   में  फंसना  ,  और  बच  के  निकल  जाना  ,
जानता  है  वो , मुश्किल  से , हंस  के  निकल  जाना !!

निभा  लेना  इक  रीत  फिर ,
फिर  तिरंगा  फहरा  लेना  ,
वर्ष  में  आज  के  दिन  ,
देशभक्ति  के  गीत  सुन  लेना ,
बाँट  देना  फिर  कुछ  पदक ,
कुछ  सच्चे  ,  कुछ  झूठे ,
देशभक्तों  में  ,  नाम  लिखा  लेना ,
पर  दिल  में  जो  जज़्बा  है ,
दिखता  है  ,  बस  नाम  को ,क्योंकि  ,
राष्ट्र गीत , तरसता  है , सम्मान  को  ,
चुभता  हो  अपमान  तो ,  और  ,
कभी  मिले  फुर्सत , तुम , खड़े  हो  लेना !!
सताए हुए  किस्मत  के  सही , पर  जिंदगी  से  न  हारे  हैं ,
कुछ  ऐसे  भी  इंसान  हैं  , जुड़े  पेट  से , भूख  से  न  हारे  हैं !!

वो  चंचल , मृग  छौने , फुदकते  झुरमुटों  से  ,
मेरे  दिल  को  नचाने  निकले  ,
और  मैं  जानवर  बन  ,
प्रकृति  को  लूटने  का  मन  बना , निकला ,
छि ! मैं  कितना  जानवर  निकला  !!

Monday, 12 August 2013

ढूंढते  रहे , जीवन  भर  संकल्प  कोए  ,
बिना  साधन  भूख  , हिवड़े में  संजोये  ,
बीनते  रहे  कूड़ा  कर्कट  सड़क  से ,
और  झिड़कियों  का  दर्द  नयनों  को  भिगोये ,
नंगे  पैरों   में न कांटे , न  तपती  रेत ,
जलन  कोई  दे  गया  तो  , बस इंसानी  भेद !!

अब  तो  मंगल  पे  भी  अमंगल  हो  गया ,
इक  लाख  इंसान  ?   न  लौटने  का  इरादा  ले ,
टिकट , स्पेस  एजेंसी   में   लेने  गया  !!

कुछ  चर्चे  हैं  , सुना  तेरे  नाम  के ,
पर  चाल  धीमी  न  हो  , सुन  शान  से ,
न  दिमाग़  ऊपर ,  न  असर  हो  काम  पे ,
तो  ये  चर्चे  ,  सदा  रहेंगे  , तेरे  सुन्दर  काम के  !!


जो  कुछ  शहर  में  ख़ास  मेरे ,  सब  किया  है  आम  ने ,
और  उस  आम  को  रुतबा  ख़ास  ,  बख्शा  तो  बस  काम  ने  !!
कुछ  नया  करने  की  चाह  ,  और  उड़ , परिंदा  वो  गया  ,
परवाह  किसे  , हासिल  मंजिलें  होंगी  ?  या  घर से  गया  !!
भले  है  स्वप्न  , पर  है  स्वप्न  ,  तो  ये  भी  सही ,
कड़वे  हों  कितने  सच ,  सच , पर  बोलेंगे  हम वही !! 

Wednesday, 7 August 2013

काश  तेरे  पैमाने  , इस   मय   से  भी  हल्के , वज़न  होते ,
हाथ  मेरे  न  उठते , तो  पैमाने , होठों  से  मेरे , लगे  होते !!
उद्घाटन  के  बाद ,
सब  एक  रंग  हो  गये  ,
जैसे  ही  नेता  गये  , 
रंग ,  सब  इमारत  के  ,
फिर  बदरंग  हो  गये !!
 
फैसले   जीवन  के  कुछ  , अब  भी   नहीं  हुए  ,
कौन  अपना  ?  पराया  कौन  ? छंटनी  नहीं  हुए  ,
भ्रमित  ,  तब  भी  थे  ,  और  अब  भी  हैं  ,
स्वार्थ  मेरे  ,  परमार्थ  से  ,  कितने  अलग ? रौशन , नहीं  हुए !!