"चलो चलके झील में हंसों से बतियाएं ,
चुने मोती कितने , कितना अलग किया पानी ,
कितना दूध मिला था , मानसरोवर में ,
जो नदियों में बहना भूल गया है अब ,
कौन थी गुजरिया , क्या नाम उसका था ,
जिसने नदिया का दूध बिलोया था ,
और नदी का दूध बन गया पानी ,
चलो हंसों से पूछें आज !!"
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"इस जहाँ में कुछ अकेले , जग से खेले ,
अब अकेले ही झुण्ड का अहसास देते हैं ,
और असंभव दिखने वाला कम ,
सहज में करके जाते हैं !!"
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बहुत बोल लिए अब , कुछ मौन हो जाए ,
इक चुप बस इक चुप , समाधान हो जाए !!"
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"खली हाथ चले आओ , किसने कहा ख़ाली है जहाँ ,
ख़ाली हाथ चले चलो , भरा वो जहाँ भी है !!"
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"बहुत बार किया मैंने कुछ ऐसा , अपनों को पराया कर आया ,
जिसको समझा था मैं दगा , वो निकला वफ़ा का साया !!"
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"सगरे जगत में तू तारणहार ,
जगत भी तू और नाव भी तू ,
सवार भी तू और पतवार भी तू ,
फिर क्यों झंझट में मन है ,
करता भी तू ,करतार भी तू !!"
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"जड़ से जुडूं और उडूं आकाश ,
ऐसे हैं एक सहारे ,
माँ बाप हमारे पेड़ सामान !!"
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"सिर्फ मन है मेरे साथ , जो दिल को मना लेता है ,
बिगाडूँ उसे भी , मेरे बस में कहाँ ."
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"दिल से खेलोगे और दाद मिलेगी ,
यार वहम ये कितना अच्छा है !!"
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"मैं नहीं कहता मुझे शायर मान ,
दिल का मारा तो कह ही सकते हो ,
तू तारीफ़ में न बोल , कुछ मीठे बोल ,
दारू सा कड़वा कुछ , हलक में तो घोल !!"
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"मुझे संदेशे कोई नहीं आते , और मैं उब भी गया हूँ मेलों से ,
जिन रिश्तों में नहीं अपनापन , उनको खींचने की ज़रुरत भी क्या है !!"
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"प्याला मेरा भर दे कोई , अंगूरी अंगूरी ,
तन्हाई के आलम में , शाम बने सिन्दूरी सिन्दूरी ,
अपने कहाँ मिलते हैं ज़माने में अब ,
इक जाम जिगर में हो तंदूरी तंदूरी !!
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"आओ चलो करलें तौबा , न तुम बोलो , न मैं बोलूँ ,
बस एक चांदनी की चादर , खामोश , शिकायत पे डालें !!"
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"न कोई चाहने वाला फिर भी , इक आवाज़ लगाता हूँ , आये कोई !
अपना न कहे , हसरत से चाहे मुझे , पर पास बुला , बहला भर जाए कोई !!"
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"घूँट दर घूँट , पीता ही गया कड़वे घूँट ,
अब न दिल ख़ाली न जिगर ख़ाली !!"
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"सूरज , पवन , आकाश , जल , पृथ्वी के बिना जीवन कहाँ ?
पर वो अपने कर्तव्यों का रोना कभी नहीं रोते ,
और एक हम , हर कदम एहसान जताए जाते हैं !!"