Sunday, 9 June 2013

शौक  मेरा  भी  था  ,  रौशन  करूँ  ज़मानें  को  ,
मालूम  किसे ? इस शौक  में  ,  जलना  पड़ेगा  !!
भूलेंगे  तेरी  भी  गुस्ताखियाँ , यारा  ,
अब  तो  सफ़र  मंजिल  के  है  क़रीब  !
मैं  तो  भूला  हूँ  , कामयाबियां  भी  मेरी ,
होके  हल्का , सफ़र से ,  जाएगा  गरीब !
मैं  तो  उनको  हैराँ  हूँ  , निभाया जिसने  भी ,
ऐसा  कुछ  ख़ास  नहीं  था  , अपना  नसीब !
अब  चाहे  अनचाहे , सब  रिश्ते , आर  ही  हैं ,
पार  जायेंगे  वोही , जित कारण लटके  सलीब !! 

किसके  पहलू  में  बसेगा  सुख  चैन  ?
ये  खुदा  का  खेल  है  यारा  ,
और  किस  पहलू  में  है  मेरा  सुख  चैन  ?
वो  खुदा  के  संग  है  यारा  !!
भीगे  हैं  आज  भी  ,  तेरी  हाँ  ना  में  ,
अये बादल , बारिश में  न  सही , पसीने  में !!
इक  शरारत , फिर  मुझे  कर  लेने  दो ,
बरसों  पहले  की , गल्ती  सर  लेने  दो ,
जो  तुमको , कहा  था  सबसे  अलग ,
उस  अलग  को  ,  अब  का  अलग कर  लेने   दो !!

उफ़ , ये  ललाट  पे  भृकुटी ,  और  आँखों  की  लालिमा  तेरी ,
जलाता  क्यों  है  अब  दिनकर  , हम  तो  छांह  भी  चाहते  हैं , तो  बस  तेरी !
क्यों  जताता  है  तू  ,  के  तू  पावर  में  है  ,
यहाँ  तो  मेंढक  भी  डराता  है  तो ,  देते  हैं  उसे  भी  उपमा ,  तेरी  !!

Monday, 3 June 2013

मेरी  आँखों  में  धूल  के  कण   ?
शायद  गुस्ताखियाँ  हैं  मेरी  ,
मेरे  हाथों  को  देते  हैं  मौका  ,
इक  और  भूल  सुधार  का  !!